Shaurya Aur Anokhi Ki Kahani Part 2 – अधूरी मुलाक़ात
अधूरी शुरुआत
उस रात की हल्की सी चुप्पी अभी भी शौर्य के दिल में गूँज रही थी। जब उसने पहली बार अनोखी को देखा था, उसकी आँखों की चमक और होंठों पर थमी हल्की सी मुस्कान उसके दिल को ऐसी गिरफ़्त में ले गई थी कि अब चाहे जितना भी कोशिश करे, वो उस एहसास से बाहर नहीं निकल पा रहा था। दिन बीत गए, लेकिन उसकी यादें एक परछाई की तरह उसके साथ-साथ चलती रहीं।
शौर्य ने अपने आपसे कई बार कहा था कि शायद ये सब उसकी कल्पना है, कोई फ़िजूल का खयाल। मगर दिल बार-बार वही सवाल करता कि अगर ये सपना है तो इतना हक़ीक़त जैसा क्यों लगता है? हर बार जब वो अपनी आँखें बंद करता, अनोखी का चेहरा उसकी आँखों के सामने उभर आता। उसकी सादगी, उसकी मासूमियत और उसकी आँखों की गहराई शौर्य के दिल को बेचैन कर देती।
लेकिन उस मुलाक़ात का एक अजीब सा अधूरापन था। जैसे कोई किताब का पहला पन्ना पढ़कर ही किसी ने किताब बंद कर दी हो। शौर्य का मन चाहता था कि वो उस कहानी को आगे बढ़ाए, उस लड़की को और जाने, उसकी दुनिया में थोड़ा और झाँके। पर किस्मत जैसे उसके साथ कोई अजीब सा खेल खेल रही थी। मुलाक़ात हुई, मगर नाम तक नहीं पूछ पाया। दिल धड़कता रह गया और लफ़्ज़ गले में ही अटक कर रह गए।
वो शाम अब शौर्य की ज़िंदगी का एक ऐसा मोड़ बन चुकी थी जिसे वो कभी भूल नहीं सकता था। एक तरफ़ दिल कहता कि उसे ढूँढना चाहिए, और दूसरी तरफ़ दिमाग कहता कि एक अनजान चेहरे के लिए इतना बेचैन होना शायद पागलपन है। लेकिन सच्चाई ये थी कि उसके दिल की बेचैनी हर दिन और गहरी होती जा रही थी।
भीड़ में तन्हाई
दिन बीतते-बीतते शौर्य की बेचैनी बढ़ती गई। शहर की गलियों, कॉलेज की कैंटीन, और उन भीड़-भाड़ वाले बाज़ारों में भी उसकी नज़र बस उसी चेहरे को ढूँढती रहती। हर किसी की आँखों में वो उसी मासूम मुस्कान को तलाशता। हर परछाई में उसे अनोखी की झलक दिखाई देती। लेकिन जितनी बार उम्मीदें जगतीं, उतनी ही बार वो टूटी भीं।
एक दिन, जब कॉलेज में नया सेशन शुरू हुआ था, कैंपस के गलियारों में हलचल और चहल-पहल थी। नए छात्रों की भीड़, उनके हंसी-ठिठोली से सारा माहौल गूंज रहा था। शौर्य भी वहीं खड़ा था, लेकिन उसका दिल और दिमाग कहीं और था। अचानक उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी। वो भीड़ में खड़ी थी, लेकिन उसकी खामोशी और उसकी आँखों की गहराई कुछ जानी-पहचानी लगी।
शौर्य का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वो वही थी... हाँ, वही लड़की जिसने उसकी ज़िंदगी को उलझा दिया था। वही मासूमियत, वही सादगी, वही जादू... लेकिन इससे पहले कि वो उसके पास जा पाता, भीड़ ने उसे ढक लिया। शौर्य ने कोशिश की, कदम बढ़ाए, मगर वो चेहरा फिर गायब हो गया।
उस भीड़ में वो पल शौर्य के लिए किसी तूफ़ान से कम नहीं था। एक पल में उम्मीदें जगीं और दूसरे ही पल फिर अधूरापन रह गया। जैसे किस्मत हर बार उसकी मंज़िल को उसके सामने लाकर, फिर छीन लेती हो।
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